मुख के ऊपरी भाग में नाक के ठीक आगे भली-भाँति संज्ञानपूर्वक स्थिर रहो,
जरा भी दाएं-बाएं नही होना,
नाक के ठीक आगे का ठीक मध्य ही ब्रह्मांड का केन्द्र है,
नाक के ठीक आगे के ठीक मध्य में जब दृष्टि का सिमटाव हो जाता है,
तब ब्रह्मांड की आधारीय सच्चाई खुल जाती है < असलियत खुल जाती है,
तुम्हारी दृष्टि बिखरी हुई है,
इसलिए तुम्हें दाएं-बाएं, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे का आभास हो रहा है,
दृष्टि का सिमटाव होते ही यह भ्रान्ति भंग हो जाती है,
यह जो विश्व-ब्रह्मांड का अंतहीन फैलाव प्रतीत हो रहा है,
दृष्टि का सिमटाव होते ही इसकी भ्रान्ति भंग हो जाती है
जब बिखरी पड़ी हुई दृष्टि का अपने ठीक केन्द्र में सिमटाव पूरा होता है,
तब सीधे ही अंतरालरहित दर्शनमात्र स्पष्ट हो जाता है,
अंतरालरहित दर्शनमात्र में सहज ही तथ्यतः निभ्रान्त यथार्थता स्पष्ट है,
उत्तरोत्तर सीधे से सीधे के सूक्ष्म से सूक्ष्म केन्द्र की ओर दृष्टि का सिमटाव होते-होते अंततः सबसे सूक्ष्म केन्द्र (सबसे सूक्ष्म अंतराल) में जब दृष्टि का सिमटाव पूर्ण हो जाता है, तब मध्य का अंतराल नही होने से दृष्टिकोण स्थापित नही होता है