जिस सीध में श्वास का आना हो रहा है उसी सीध में श्वास का जाना भी हो रहा है, हर बार ही श्वास का आना-जाना एक ही सीध में हो रहा है,
इसलिए जब भी श्वास भीतर आती है, बाहर जाती है, उसके सीध को भलीभाँति याद रखते हुए उसके सीध में सावधानीपूर्वक पहले से ही स्मृतिपूर्वक सजग हो स्थिर हो जाओ, इस तरह बिना ज्ञात हुए (बिना मालूम हुए) एक भी श्वास नही छूटेगी
दृष्टि की स्थिरता के लिए स्थिर सीध का अवलंबन होना बहुत ही आवश्यक है, ध्यान रहे श्वास चलायमान है पर जिस सीध में श्वास का ज्ञान है वह सीध चलायमान न होकर स्थिर है
इसलिए चलायमान श्वास पर नही बल्कि श्वास के ज्ञानमात्र में उसके स्थिर सीध पर ही ध्यान रखना है, दृष्टि रखनी है कुछ साधक पूछते हैं कि ध्यान कहाँ रखना है, दृष्टि कहाँ रखनी है, उनके लिए यहाँ सांकेतिक उत्तर दे दिया गया है…….
अगर यह बात समझ में नही आ रही है तो यह बात समझ लो कि सांस का आना-जाना जहाँ मालूम हो रहा है बस वहीं पर ध्यान रखो, नजर रखो
अगर यह बात भी समझ में नही आ रही है तो नाक के छिद्रों में जहाँ श्वास का स्पर्श महसूस हो रहा है बस वहीं पर चुपचाप ठहरे रहो हिलना नही….. बिना हिले-डुले चुपचाप ठहरे रहो, बिना ठहरे दृष्टि नही खुलेगी, बुद्धि नही खुलेगी.