आरंभिक साधना के परिप्रेक्ष्य में साक्षी-भाव की साधना महत्वपूर्ण है,
साक्षी-भाव की साधना में तुम ज्ञाता भर होते हो, दृष्टा भर होते हो,
अर्थात् जो कुछ भी जानने में आ रहा है, जो कुछ भी ज्ञात होने में है<उससे पृथक हो उसके प्रति बस ज्ञाता भर होते हो,
जो कुछ भी देखने में आ रहा है>(जो कुछ भी दिखने में है) उससे पृथक हो उसके प्रति बस दृष्टा भर होते हो,
साक्षी-भाव की साधना में तुम्हें जो कुछ भी ज्ञात हो रहा है, जो कुछ भी दिख रहा है<वह तुम नही हो बल्कि तुम उसके ज्ञाता भर हो, दृष्टा भर हो,
ज्ञाता भर होने के, दृष्टा भर होने के परिप्रेक्ष्य में तुम बस साक्षी भर हो<यह साक्षी-भाव की भावनीय भावना है,
साक्षी-भाव की साधना में किसी सीमा तक अवश्य ही तादात्म्यता भंग होती है,
पर साक्षी-भाव की साधना में आरोपित आत्म-भाव भंग नही हो पाता,
इसके लिए ज्ञाता-भाव से<(दृष्टा-भाव से) अनिमित्त हो ज्ञानमात्र के<(दर्शनमात्र के) निमित्त होना पड़ता है,
ज्ञानमात्र में<(दर्शनमात्र में) तुम अलग से ज्ञाता नही होते हो<(अलग से दृष्टा नही होते हो) बल्कि बस केवल उपस्थित भर होने में निमित्त भर होते हो,
जिसने पहले साक्षी-भाव की भावनीय भावना का निमित्त पूरा किया है अर्थात् साक्षी-भाव की साधना का निमित्त पूरा किया है<वही फिर सीधे अंतरालरहित ज्ञानमात्र के<(दर्शनमात्र के) निमित्त हो सकता है,
ज्ञानमात्र में<(दर्शनमात्र में) आत्म-भाव का आरोप नही बचता,
ज्ञानमात्र से<(दर्शनमात्र से) इतर होने पर ही तुम सापेक्षिक दबाव-स्वरूप ज्ञाता-ज्ञेय के<(दृष्टा-दृश्य के) अंतराल में ज्ञाता-भाव में<(दृष्टा-भाव में) आबद्ध हो व्यक्ति-भाव को प्राप्त हुए हो अन्यथा तो तुम उपस्थित भर होने की सहज भूमिका में निमित्त भर ही हो,
ज्ञानमात्र का तात्पर्य ज्ञाता-ज्ञेय से अनिमित्त बिना किसी अंतराल के बस सीधे ही केवल ज्ञात भर होने से है,
दर्शनमात्र का तात्पर्य दृष्टा-दृश्य से अनिमित्त बिना किसी अंतराल के बस सीधे ही केवल दिखना भर होने से है,
असल में तो ज्ञात भर होना ही (ज्ञान भर ही) है<(दिखना भर ही है),
ज्ञान भर में<(दिखने भर में) निमित्तमात्र बस उपस्थित भर होना ही है<इसी में स्थिरता का निमित्त पूरा करना है,
स्थिरता का निमित्त पूरा होते ही जल-कमलवत सम्यग् सिद्धावस्था है,
उपस्थिति भर की निमित्त भर भूमिका में सहज ही परिस्पष्टतः चेतनता की परिपूर्णता है,
चूँकि ज्ञानमात्र में ही<(दर्शनमात्र में ही) उपस्थिति भर की निमित्त भर भूमिका सिद्ध होती है न कि ज्ञाता-भाव में<(दृष्टा-भाव में),
अतः ज्ञानमात्र में<(दर्शनमात्र में) अलग से ज्ञाता नही होने से<(अलग से दृष्टा नही होने से) अलग से साक्षी-भाव भी स्थापित नही होता,
क्योंकि साक्षी होने के लिए ज्ञाता का<(दृष्टा का) आधार चाहिए,
साक्षी-भाव से ही स्वभाव की भ्रांति होती है,
स्वरूप की भ्रांति होती है,
आत्मवादियों का सम्पूर्ण धर्म साहित्य (गीता-उपनिषद-पुराण आदि) इसी भ्रांति में है,
ज्ञाता-भाव<(दृष्टा-भाव) के परिप्रेक्ष्य साक्षी-भाव ही कर्ता-भाव का आधार है, भोक्ता-भाव का आधार है,
आरोप-कर्ता गीताकार को अपने को अकर्ता कहना उसके मिथ्या अहंमन्यता के आरोप वाले दोष से बरी नही करता बल्कि यह बहुत ही चालाकी भरी बेईमानी है,
आत्मवादी का अपने को अकर्ता कहना हास्यास्पद है,
(ध्यान रहे यहाँ किसी के लिए भी निंदात्मक प्रयोजन नही है,
अगर किसी को अज्ञानवश भ्रांति में ऐसा लगता है तो उसके लिए खेद व्यक्त किया जाता है,
तुम्हारा लोकदृष्टि का सम्मोहन भंग हो,
तुम्हारी सम्यग् यथार्थनिष्ठा में महत्वबुद्धि हो, तुम्हारा सम्यग् कल्याण हो,
तुम्हारा भ्रम, संशय, संदेह, अज्ञान, दुःख-क्लेश भंग हो<इस उद्देश्य से गीता आदि अपेक्षाकृत दबाव-स्वरूप अपेक्षित दृष्टिकोण विशेष से सावधान करना पड़ता है,
दृष्टिकोण विशेष से सावधान करने के लिए लोक भाषा के 'रफ' शब्द भी प्रयोग करने पड़ते हैं क्योंकि इससे तुम अपेक्षाकृत अधिक सावधान होते हो),
_आत्मवाद हो अथवा अनात्मवाद हो हर वाद से सावधान रहो,
न आत्मवाद तथा न ही अनात्मवाद अपितु इन दोनों वादों से अनिमित्त इन दोनों के
माध्यमिक-संतुलन के आधार में उपस्थिति भर की निमित्त भर भूमिका ही सिद्ध है,
अकर्ता कहना उपस्थिति भर की निमित्त भर भूमिका में ही सिद्ध है न कि आत्म-भाव रहते,
ध्यान रहे निमित्तमात्र की भूमिका अक्रिय ज्ञानमात्र के निमित्त ही सिद्ध है न कि किसी के मिथ्या ईश्वरीय अहंकार के निमित्त,
इस अर्थ में गीता में निमित्तमात्र की भूमिका के साथ सम्यग् न्याय नही है,
कहाँ अशांत-अस्थिर, आवेशयुक्त-क्रियात्मक अहंकार और कहाँ शांत-स्थिर, आवेशरहित-अक्रिय ज्ञानमात्र<इसमें तुलना ही संभव नही,
ध्यान रहे तुम किसी की भी शरण चले जाओ पर अक्रिय ज्ञानमात्र के निमित्तमात्र उपस्थिति भर की निमित्त भर भूमिका के बिना कर्म-फल बंधन से कदापि मुक्ति नही,
अतः निमित्तमात्र का सम्यग् तात्पर्य ही ग्रहण हो अन्यथा दिग्भ्रम होना स्वाभाविक है,
(ध्यान रहे नासिकाग्र की बात श्वास के आने-जाने के मध्य की सीध के बिना अधूरी है),
अगर किसी को सांख्य के बारे में अथवा योग के बारे में अवगत होना हो तो उसके आधारीय स्रोत से ही अवगत होना चाहिए,
गीता आदि में सांख्य की, योग की अपने अपेक्षित दृष्टिकोण के अनुसार ही व्याख्या है न कि उसकी सत्यता में,
भले ही सांख्य-दर्शन तथा योग-दर्शन अपेक्षाकृत शुद्ध हैं परंतु पूर्णतः शुद्ध नही,
अतः शुद्धि पूरी हो इसके लिए सांख्य<(योग) आदि दर्शनों से भी आगे फिर अंततः अक्रिय ज्ञानमात्र के निमित्त उपस्थिति भर की निमित्त भर भूमिका के परिप्रेक्ष्य में स्थिरता का निमित्त पूरा करना आवश्यक है,
स्थिरता का निमित्त पूरा हो इसके लिए सबसे पहले श्वास के ज्ञात होने में दर्शनपूर्वक<(निगरानीपूर्वक) उपस्थित होने के परिप्रेक्ष्य में स्थिर होना है,
जब तक श्वास के आने-जाने के समय से भी निकट वर्तमान में उपस्थित होने की सहजता न हो जाए तब तक निरंतर श्वास प्रति श्वास<(प्रत्येक श्वास) के ज्ञात होने में उसके ठीक समय पर उपस्थित होते रहने का निमित्त पूरा करना है,
इस तरह जब तक सबसे निकट वर्तमान में उपस्थिति पूरी न हो जाए तब तक उत्तरोत्तर निकट से निकट वर्तमान में उपस्थित होने का निमित्त पूरा करना आवश्यक है,
सबसे सूक्ष्म अंतराल में जब संभलना पूरा हो जाता है तब फिर उस संभलने में अलग से उपस्थित होने के लिए स्थान-समय का अंतराल नही बचता, सबसे कम स्थान-समय पर संभलने पर जब फिर से अपनी तरफ से उपस्थित होना नही बचता, स्थान-समय नही बचता<इसके आगे अब कहने के लिए कुछ भी नही बचता...
_कुछ भी कहोगे तो सब गड़बड़ हो जाएगा,
दृष्टिकोण स्थापित हो जाएगा,
बंधन स्थापित हो जाएगा,
तुम्हें सम्यग् संकेतार्थ दिशा>> स्पष्ट हो...